अमेरिका ने ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। समुद्र में अमेरिकी नाकेबंदी के चलते उसके लिए दूसरे देशों से सैन्य सामान मंगाना भी मुश्किल है। इसके बावजूद ईरान ने हथियारों की सप्लाई जारी रखी।
रॉयटर्स की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने 5000 से ज्यादा फर्जी सरकारी एजेंसियों का नेटवर्क बनाया। इनके जरिए चीन, रूस और दूसरे देशों से मिसाइलों के पुर्जे, विस्फोटक, रॉकेट का ईंधन बनाने वाले केमिकल और भारी ट्रक खरीदे गए।
ईरान ने तेल बेचकर सैन्य सामान खरीदा
जनवरी 2025 से जून 2026 के बीच इस नेटवर्क के जरिए करीब 2 लाख करोड़ रुपए का सामान खरीदा गया। यह पूरा नेटवर्क ईरान के रक्षा मंत्रालय और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़ा है।
इस नेटवर्क के जरिए ईरान तेल बेचकर मिलने वाले पैसों से सैन्य सामान खरीदता था। इसके लिए बिचौलियों और विदेशों में बनी फर्जी कंपनियों की मदद ली जाती थी। जांच रिपोर्ट में पता चला कि यह तरीका 2016 से इस्तेमाल हो रहा था।
एजेंसियों के नाम में छिपा था नेटवर्क का राज
रॉयटर्स ने इजराइल-अमेरिका की रिस्क कंसल्टेंसी ‘240 एनालिटिक्स’ के साथ मिलकर इस नेटवर्क की जांच की। इसमें पता चला कि इन एजेंसियों के नाम MOD से शुरू होते थे और आगे 5 या 6 अंकों का नंबर होता था।
इनके दस्तावेजों में ईरान के रक्षा मंत्रालय का तेहरान वाला पता और बनने की तारीख 11 फरवरी 1979 दर्ज थी। इसी दिन अयातुल्ला खुमैनी ने ईरान की सत्ता संभाली थी।
हालांकि, रिकॉर्ड के मुताबिक ज्यादातर एजेंसियां 2013 में बनाई गई थीं। उस समय अमेरिकी प्रतिबंधों से ईरान का तेल कारोबार प्रभावित हो रहा था।
इन एजेंसियों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए बिचौलियों और विदेशों में फर्जी कंपनियों का सहारा लिया। इन्हें ट्रस्टी कहा जाता है। ये लोग तेल बेचकर मिले पैसों से सैन्य सामान खरीदते थे।
रॉयटर्स ने जिन सौदों की जांच की, उनमें 97% खरीदारी बिना सीधे पैसे भेजे हुई थी। यानी एक देश से दूसरे देश में रकम ट्रांसफर करने की जरूरत नहीं पड़ी। इससे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम की नजर से बचना आसान हो गया।
लीक हुए बैंक दस्तावेजों से मिला सुराग
इस नेटवर्क का पता जून 2025 में ‘240 एनालिटिक्स’ के अर्थशास्त्री नोआम बिनस्टॉक को चला। वह बैंक सेपाह के लीक हुए दस्तावेजों की जांच कर रहे थे। यह बैंक IRGC के कर्मचारियों को वेतन भी देता है। ये दस्तावेज टेलीग्राम और विकीईरान वेबसाइट पर सामने आए थे।
इन दस्तावेजों के मुताबिक, दिसंबर 2024 के आखिर में 36 एजेंसियों के पास करीब 1.2 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा थी। बाकी एजेंसियों के पास करीब 1.8 अरब डॉलर के बराबर ईरानी मुद्रा थी।
जांच में पता चला कि ये एजेंसियां तेल से होने वाली कमाई हासिल कर रही थीं और उससे ऐसे सामान खरीद रही थीं, जिनका इस्तेमाल हथियार बनाने में भी हो सकता है।
हर एजेंसी का 11 अंकों का अलग पहचान नंबर था। यही नंबर शिपिंग दस्तावेजों, बिलों और बैंक खातों में भी दर्ज था। इससे फर्जी कंपनियों के पीछे छिपे इस पूरे नेटवर्क का पता लगाना संभव हुआ।
इन सीक्रेट एजेंसियों ने क्या-क्या खरीदा?
MOD 346428 नाम की एक एजेंसी ने जनवरी 2025 से जून 2026 के बीच 2.3 अरब डॉलर का सामान खरीदा। इसमें रॉकेट ईंधन बनाने वाले केमिकल, विस्फोटक और हथियारों के पुर्जे शामिल थे।
जनवरी से अप्रैल 2025 के बीच इसने चीन से 886 टन सोडियम क्लोरेट और परक्लोरेट जैसे केमिकल मंगाए। इनका इस्तेमाल ठोस ईंधन वाले रॉकेट बनाने में होता है।
रॉयटर्स के मुताबिक, 26 अप्रैल 2025 को शाहिद रजाई बंदरगाह पर हुए विस्फोट की वजह भी सोडियम परक्लोरेट था। कंटेनरों में आग लगने से यह केमिकल फट गया था। हादसे में 70 लोगों की मौत हुई और 1,200 से ज्यादा घायल हुए।
वहीं, एक एजेंसी ने 435 इवेको ट्रक भी खरीदे, जिन्हें बदलाव करके मोबाइल मिसाइल लॉन्चर बनाया जा सकता है।
युद्ध शुरू होने के बाद भी जारी रही खरीदारी
रॉयटर्स की जांच के मुताबिक, 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद भी ईरान में सामान पहुंचता रहा।
युद्ध के दौरान मार्च में ईरान का मासिक आयात 47% घटकर 5.4 करोड़ डॉलर रह गया, लेकिन मई में फिर बढ़कर 7.7 करोड़ डॉलर हो गया।
रूस से 76 लाख डॉलर के डेटोनेटर पांच खेप में पहुंचे। आखिरी खेप जून में आई। UAE से भी 2.7 करोड़ डॉलर का सामान आया, जिसकी सबसे नई खेप जून में अमेरिकी नाकेबंदी में ढील के कुछ दिन बाद पहुंची।
ईरान ने कंप्यूटर से चलने वाली खराद मशीनें और इलेक्ट्रॉन बीम भट्टियां भी खरीदीं। इनका इस्तेमाल मिसाइल और ड्रोन के ढांचे बनाने में हो सकता है।
अमेरिका ने यूक्रेन को 500 पैट्रियट मिसाइलें बेचने की मंजूरी दे दी है। इस डील की कीमत करीब 19 हजार करोड़ रुपए है। इसका पूरा खर्च यूरोपीय देश और कनाडा उठाएंगे।