नई दिल्ली: राजस्थान में बिजली की मांग पूरी करने के लिए धौलपुर गैस पावर प्लांट से बेहद महंगी बिजली खरीदी जा रही है। अक्टूबर में यहां बिजली बनाने की लागत 46.09 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच गई। यह देश में बिजली उत्पादन की सबसे ऊंची लागत बताई जा रही है। हालांकि, प्लांट के लिए बिजली खरीद समझौते (PPA) में कोई मंजूर टैरिफ नहीं है। ऐसे में बिजली बनाने पर होने वाला खर्च वसूलना बड़ी चुनौती बन गया है।

राजस्थान ऊर्जा विकास एवं आईटी सर्विसेज लिमिटेड (RUVITL) राज्य की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के लिए बिजली खरीदती है। मांग बढ़ने और खुले बाजार में बिजली की सीमित उपलब्धता के कारण कंपनी को आपात स्थिति में धौलपुर प्लांट का सहारा लेना पड़ रहा है।
12 दिन में 30 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिजली

अक्टूबर के शुरुआती 12 दिनों में धौलपुर प्लांट ने 30 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिजली सप्लाई की। इस दौरान बिजली बनाने की लागत 41 से 46 रुपये प्रति यूनिट के बीच रही।

प्लांट का संचालन राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RVUNL) करता है। मंजूर टैरिफ वाला बिजली खरीद समझौता नहीं होने के कारण वह इस खर्च की भरपाई डिस्कॉम से नहीं कर सकता। ऐसे में बिजली उत्पादन की लागत का वित्तीय बोझ उसे खुद उठाना पड़ रहा है।
जुलाई और सितंबर में भी चलाना पड़ा प्लांट

राजस्थान में बिजली की कमी के दौरान धौलपुर गैस प्लांट का पहले भी इस्तेमाल किया गया था। जुलाई में इसे लगातार पांच रातों तक चलाया गया था। उस समय बिजली बनाने की लागत करीब 30 रुपये प्रति यूनिट थी और कुल खर्च लगभग 13 करोड़ रुपये रहा।

सितंबर में भी कोयले की कमी और थर्मल पावर प्लांट बंद होने के कारण धौलपुर प्लांट से बिजली ली गई। उस दौरान बिजली उत्पादन की लागत 35 रुपये प्रति यूनिट से ज्यादा थी।

तमिलनाडु भी शामिल

महंगी आपातकालीन बिजली खरीदने वाला राजस्थान अकेला राज्य नहीं है। तमिलनाडु में भी बिजली की कमी पूरी करने के लिए 37 रुपये प्रति यूनिट तक की दर से बिजली खरीदने पर सहमति बनी। यह राज्य की अब तक की सबसे महंगी बिजली खरीद बताई गई है।

तमिलनाडु में केंद्रीय बिजली संयंत्रों में रखरखाव और पवन ऊर्जा उत्पादन घटने के कारण करीब 4,000 मेगावाट बिजली की कमी हो गई थी। इस दौरान राज्य में बिजली की अधिकतम मांग लगभग 20,000 मेगावाट तक पहुंच गई थी। कोयले से बनने वाली बिजली खुले बाजार में पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलने के कारण तमिलनाडु को भी महंगे गैस आधारित बिजली उत्पादन का सहारा लेना पड़ा।

मांग और सप्लाई के बीच तालमेल जरूरी

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्थान और तमिलनाडु के मामले बिजली की मांग और सप्लाई के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत दिखाते हैं। अचानक मांग बढ़ने या बिजली उत्पादन घटने पर महंगी बिजली खरीदने से बचने के लिए ऐसे ऊर्जा स्रोत जरूरी हैं, जिनसे जरूरत के समय तेजी से बिजली बनाई जा सके।

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े एनजीओ समता पावर के निदेशक डीडी अग्रवाल ने कहा कि केवल बिजली उत्पादन की क्षमता तैयार करना पर्याप्त नहीं है। बिजली व्यवस्था में ऐसे लचीले और तेजी से चालू होने वाले ऊर्जा स्रोत भी होने चाहिए, जो अचानक बढ़ी मांग को पूरा कर सकें और लागत को नियंत्रण में रखें। उनके मुताबिक, फिलहाल आपातकालीन बिजली खरीद से पड़ने वाले वित्तीय बोझ को संभालना और भविष्य के लिए ऐसे बिजली उत्पादन विकल्प तैयार करना जरूरी है, जिन्हें जरूरत के हिसाब से बढ़ाया जा सके।